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नई दिल्ली: भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई असामान्य घटना के बावजूद पूरी तरह शांत और संयमित रहे। उन्होंने न्यायालयीय कार्यवाही को बाधित नहीं होने दिया और अगली सुनवाई नियमित रूप से पूरी की।
महाराष्ट्र के अमरावती में जन्मे गवई एक ऐसे परिवार से आते हैं, जो समाज सेवा और कानून के क्षेत्र से जुड़ा रहा है। उनके पिता, रा. एस. गवई, पूर्व राज्यपाल और समाजसेवी रहे हैं। नागपुर में वकालत कर न्याय व्यवस्था में प्रवेश करने वाले गवई ने बॉम्बे उच्च न्यायालय और फिर सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश के रूप में कार्य किया। 14 मई 2025 को वे भारत के मुख्य न्यायाधीश बने। दलित-बौद्ध समुदाय से सुप्रीम कोर्ट के सर्वोच्च पद पर पहुंचने वाले वे दूसरे न्यायाधीश हैं।
गवई हमेशा संवैधानिक मूल्यों, कानून के शासन और सामाजिक न्याय के समर्थक रहे हैं। उन्होंने राज्य सरकारों द्वारा अपनाई जाने वाली ‘बल्डोजर न्याय’ जैसी नीतियों की सख्त आलोचना की है। उनका मानना है कि न्यायाधीशों को संयमित रहना चाहिए और न्यायालय की प्रतिष्ठा बनाए रखते हुए निर्णयों के माध्यम से ही न्याय व्यक्त होना चाहिए।
हालांकि, उनके कार्यकाल में कुछ विवाद भी रहे हैं। खजुराहो मंदिर में मूर्ति पुनर्स्थापन के मामले में उन्होंने कहा था, “जाओ और अपनी देवता से पूछो।” कुछ लोगों ने इसे धार्मिक संवेदनशीलता के खिलाफ माना। गवई ने बाद में स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी भी धर्म का अपमान करना नहीं था।
घटना का विवरण:
सोमवार सुबह सुप्रीम कोर्ट में एक व्यक्ति ने मुख्य न्यायाधीश गवई की ओर कुछ फेंकने का प्रयास किया। कुछ लोगों का कहना है कि यह कागज का गुंडा था, जबकि अन्य के अनुसार यह चप्पल थी। इस दौरान व्यक्ति ने घोषणा करते हुए कहा, “सनातन धर्म का अपमान सहन नहीं करेंगे।” सुरक्षा कर्मियों ने तुंरत उसे पकड़ कर बाहर ले गए।
घटना के बावजूद मुख्य न्यायाधीश गवई ने शांत रहते हुए अगली वादी को अपनी दलील रखने की अनुमति दी। उन्होंने उपस्थित लोगों से कहा, “इससे विचलित न हों, हम भी नहीं हुए।” उनकी इस प्रतिक्रिया ने न्यायालय में अनुशासन, संयम और संतुलन का बेहतरीन उदाहरण पेश किया।












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